वन्य जीव संघर्ष की घटनाओं में साहसिक प्रदर्शन करने वाले आम लोगों को किया जाएगा राज्य स्तर पर पुरस्कृत
देहरादून, न्यूज़ आई : उत्तराखंड में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष से निपटने के लिए सरकार अब स्थानीय स्तर पर लोगों की भागीदारी बढ़ाने जा रही है. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर हर जनपद में मानव-वन्यजीव संघर्ष निवारण समिति गठित करने की तैयारी है. इन समितियों में अधिकारियों के साथ पंचायत प्रतिनिधियों और स्थानीय लोगों को भी शामिल किया जाएगा. ग्रामीणों के सुझावों के आधार पर संघर्ष की घटनाओं को रोकने और प्रभावित क्षेत्रों के लिए स्थानीय समाधान तैयार किए जाएंगे.
राज्य में वर्ष 2000 से सितंबर 2025 तक मानव-वन्यजीव संघर्ष में 1,256 लोगों की मौत और 6,433 लोग घायल हुए हैं. वहीं, 2026 के शुरुआती छह महीनों में ही वन्यजीव हमलों में 36 लोगों की मौत हो चुकी है. ऐसे में सरकार का फोकस अब समुदाय आधारित समाधान पर है. उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष लगातार गंभीर चुनौती बनता जा रहा है. पहाड़ी क्षेत्रों में गुलदार और भालू से लेकर मैदानी इलाकों में हाथी और बाघ तक. अलग-अलग वन्यजीवों के साथ इंसानों का टकराव लगातार सामने आ रहा है. कई बार ये घटनाएं ग्रामीणों की जान पर भारी पड़ती हैं, तो कई मामलों में खेतों और घरों को नुकसान पहुंचने से लोगों की आजीविका भी प्रभावित होती है.
लंबे समय से चले आ रहे इस संघर्ष के बीच अब सरकार ने समस्या के समाधान के लिए स्थानीय समुदाय को सीधे जोड़ने की दिशा में कदम बढ़ाया है. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर वन विभाग को जनपद स्तर पर मानव-वन्यजीव संघर्ष निवारण समितियां गठित करने के निर्देश दिए गए हैं. इन समितियों का उद्देश्य केवल घटना के बाद राहत और बचाव तक सीमित नहीं होगा, बल्कि संघर्ष की घटनाओं को रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर पहले से रणनीति तैयार करना भी होगा. समिति में वन विभाग के अधिकारियों के साथ-साथ जिला प्रशासन, पंचायत प्रतिनिधियों और प्रभावित क्षेत्रों के स्थानीय लोगों को शामिल किए जाने की तैयारी है.
वन विभाग का मानना है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष का प्रभाव हर क्षेत्र में अलग-अलग है. किसी इलाके में गुलदार का खतरा अधिक है तो कहीं हाथियों के कारण ग्रामीण परेशान हैं. कई क्षेत्रों में जंगल और आबादी के बीच लगातार बढ़ती गतिविधियों के कारण वन्यजीवों का मूवमेंट गांवों की ओर बढ़ रहा है. ऐसे में स्थानीय लोगों के पास समस्या और उसके कारणों को लेकर सबसे अधिक व्यावहारिक जानकारी होती है. यही वजह है कि अब पंचायतों को समाधान की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका देने पर जोर दिया जा रहा है.प्रस्तावित समितियां अपने-अपने जिलों में संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करेंगी. इसके साथ ही ग्रामीणों से सुझाव लिए जाएंगे कि किन स्थानों पर वन्यजीवों की आवाजाही अधिक है, किन रास्तों से वन्यजीव आबादी में पहुंचते हैं और किन उपायों से घटनाओं को कम किया जा सकता है. स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर तैयार योजनाओं को आगे बढ़ाने पर जोर रहेगा. इसमें जागरूकता अभियान, संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी, ग्रामीणों को त्वरित सूचना उपलब्ध कराने और वन विभाग तथा स्थानीय लोगों के बीच बेहतर समन्वय जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं.
